राजस्थान के भौतिक विभाग

राजस्थान के भौतिक विभाग

पृथ्वी अपने निर्माण के प्रराम्भिक काल में एक विशाल भू-खण्ड पैंजिया तथा एक विशाल महासागर पैंथालासा के रूप में विभक्त था कलांन्तर में पैंजिया के दो टुकडे़ हुए उत्तरी भाग अंगारालैण्ड तथा दक्षिणी भाग गोडवानालैण्ड के नाम जाना जाने लगा। तथा इन दोनों

भू-खण्डों के मध्य का सागरीय क्षेत्र टेथिस सागर कहलाता है। राजस्थान का पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्र तथा उसमें स्थित खारे पानी की झीलें टेथिस सागर का अवशेष है। जबकि राजस्थान का मध्य पर्वतीय प्रदेश तथा दक्षिणी पठारी क्षेत्र गोडवानालैण्ड का अवशेष है।

भौतिक विभाग:-

राजस्थान को समान्यतः चार भौतिक विभागो में बांटा जाता हैः-

  1. पश्चिमी मरूस्थली प्रदेश
  2. अरावली पर्वतीय प्रदेश
  3. पूर्वी मैदानी प्रदेश
  4. दक्षिणी पूर्वी पठारी भाग
  1. पश्चिमी मरूस्थली प्रदेशः-

राजस्थान का अरावली श्रेणीयों के पश्चिम का क्षेत्र शुष्क एवं अर्द्धशुष्क मरूस्थली प्रदेश है। यह एक विशिष्ठ भौगोलिक प्रदेश है। जिसे भारत का विशाल मरूस्थल अथवा थार का मरूस्थल के नाम से जाना जाता है। थार का मरूस्थल विश्व का सर्वाधिक आबाद तथा वन

वनस्पति वाला मरूस्थल है। ईश्वरी सिंह ने थार के मरूस्थल को रूक्ष क्षेत्र कहा है। राज्य के कुल क्षेत्रफल का 61 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में राज्य की 40 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

प्राचीन काल में इस क्षेत्र से होकर सरस्वती नदि बहती थी। सरस्वती नदी के प्रवाह क्षेत्र के जैसलमेर जिले के चांदन गांव में चांदन नलकुप की स्थापना कि गई है। जिसे थार का घडा कहा जाता है।

इसका विस्तार बाड़मेर, जैसलमेर, बिकानेर, जोधपुर, पाली, जालोर, नागौर,सीकर, चुरू झूझूनु, हनुमानगढ़ व गंगानगर 12 जिलों में है।संपुर्ण पश्चिमी मरूस्थलिय क्षेत्र समान उच्चावच नहीं रखता अपीतु इसमें भिन्नता है। इसी भिन्नता के कारण इसको 4 उपप्रदेशों में

विभक्त किया जाता है-

  1. शुष्क रेतीला अथवा मरूस्थलीय प्रदेश
  2. लूनी- जवाई बेसीन
  3. शेखावाटी प्रदेश
  4. घग्घर का मैदान

1 शुष्क रेतीला अथवा मरूस्थलीय प्रदेश:-

यह वार्षिक वर्षा का औसत 25 सेमी. से कम है। इसमें जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर एवं जोधपुर और चुरू जिलों के पश्चिमी भाग सम्मलित है। इन प्रदेश में सर्वत्र बालुका – स्तुपों का विस्तार है।

पश्चिमी रेगीस्तान क्षेत्र के जैसलमेर जिले में सेवण घास के मैदान पाए जाते है। जो कि भूगर्भिय जल पट्टी के रूप में प्रसिद्ध है। जिसे लाठी सीरिज कहलाते है।

पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्र के जैसलमेर जिले में लगभग 18 करोड़ वर्ष पुराने वृक्षों के अवशेष एवं जीवाश्म मिले है। जिन्हें ? अकाल वुड फाॅसिल्स पार्क? नाम दिया है। पश्चिमी रेगिस्तान क्षेत्र के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर जिलों में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैसों के भंडार

मिले है।

2 लुनी – जवाई बेसीनः-

यह एक अर्द्धशुष्क प्रदेश है। जिसमें लुनी व इसकी प्रमुख नदी जवाई एवं अन्य सहायक नदियां प्रवाहित होती है। इसका विस्तार पालि, जालौर, जौधपुर व नागौर जिले के दक्षिणी भाग में है। यह एक नदी निर्मीत मैदान है। जिसे लुनी बेसिन के नाम से जाना जाता है।

3 शेखावाटी प्रदेशः-

इसे बांगर प्रदेश के नाम से जाना जाता है। शेखावटी प्रदेश का विस्तार झुझुनू, सीकर, चुरू तथा नागौर जिले के उतरी भाग में है। इस प्रदेश में अनेक नमकीन पानी के गर्त(रन) हैं जिसमें डीडवाना, डेगाना, सुजानगढ़, तालछापर, परीहारा, कुचामन आदि प्रमुख है।

4 घग्घर का मैदानः-

गंगानगर हनुमानगढ़ जिलों का मैदानी क्षेत्र का निर्माण घग्घर के प्रवाह क्षेत्र के बाढ़ से हुआ है।

तथ्यः- भारत का सबसे गर्म प्रदेश राजस्थान का पश्चिमी शुष्क प्रदेश है।

टीलों के बीच की निम्न भूमी में वर्षा का जल भरने से बनी अस्थाई झीलों को स्थानीय भाषा में टाट या रन कहा जाता है।

राष्ट्रीय कृषि आयोग द्वारा राजस्थान के 12 जिलों श्री गंगानगर, हनुमानगढ, बीकानेर, नागौर, चुरू, झुझुनू, जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, पाली, जालौर व सीकर को रेगिस्तानी घोषित किया।

मरूस्थलीय क्षेत्र में पवनों की दिशा के समान्तर बनने वाले बालूका स्तुपों को अनुर्देघय बालूका, समकोण बनाने वाले बालूका स्तुपों को अनुप्रस्थ बालुका कहतें है।

(क) इर्ग:- सम्पूर्ण रेतीला मरूस्थल (जैसलमेर)

(ख) हम्माद:- सम्पूर्ण पथरीला मरूस्थल (जोधपुर)

(ग)  रैंग:- रेतीला और पथरीला (मिश्रित मरूस्थल)

रेगिस्तानी क्षेत्र में बालूका स्तूपों के निम्न प्रकार पाये जाते है।

1 अनुप्रस्थ:- पवन/वायु की दिशा में बनने वाले बालुका स्तूप (सीधे)

2 अनुदैध्र्य :- आडे -तीरछे बनने वाले बालुका स्तूप

3 बरखान  :- रेत के अर्द्धचन्द्राकार बालुका स्तूप

2 अरावली पर्वतीय प्रदेशः-

राज्य के मध्य अरावली पर्वत माला स्थित है। यह विश्व की प्राचीनतम वलित पर्वत माला है। यह पर्वत श्रृंखला श्री केम्ब्रियन (पोलियोजोइक) युग की है। यह पर्वत श्रृखला दंिक्षण-पश्चिम से उतर-पूर्व की ओर है। इस पर्वत श्रृंखला की चौैडाई व ऊंचाई  दक्षिण -पश्चिम में

अधिक है। जो धीरे -धीरे उत्तर-पूर्व में कम होती जाती है।

यह दक्षिण -पश्चिम में गुजरात के पालनपुर से प्रारम्भ होकर उत्तर-पूर्व में दिल्ली तक लम्बी है। जबकि राजस्थान में यह श्रंृखला खेडब्रहमा (सिरोही) से खेतड़ी (झुनझुनू) तक 550 कि.मी. लम्बी है जो कुल पर्वत श्रृंखला का 80 प्रतिशत है।

अरावली पर्वत श्रंृखला राजस्थान को दो असमान भागों में बांटती है। अरावली पर्वतीय प्रदेश का विस्तार राज्य के जिलों सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, जयपूर, दौसा और अलवर में आदि में है।

अरावली पर्वतमाला की औसत ऊँचाई समुद्र तल से 930 मीटर है।

राज्य के कुल क्षेत्रफल का 9.3 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में राज्य की 10 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

अरावली पर्वतमाला को ऊँचाई के आधार पर तीन प्रमुख उप प्रदेशों में विभक्त किया गया है।

1 दक्षिणी अरावली प्रदेश

2 मध्यवर्ती अरावली प्रदेश

3 उतरी – पूर्वी अरावली प्रदेश

1 दक्षिणी अरावली प्रदेश:-

इसमें सिरोही उदयपुर और राजसमंद सम्मिलित है। यह पुर्णतया पर्वतीय प्रदेश है इस प्रदेश में गुरूशिखर(1722 मी.) सिरोही जिले में मांउट आबु क्षेत्र में स्थित है जो राजस्थान का सर्वोच्च पर्वत शिखर है।

यहां की अन्य प्रमुख चोटियां निम्न है:-

सेर(सिरोही)-1597 मी. , देलवाडा(सिरोही)-1442 मी. , जरगा-1431 मी. , अचलगढ़- 1380 मी. , कुंम्भलगढ़(राजसमंद)-1224 मी.

प्रमुख दर्रे(नाल)ः-

जीलवा कि नाल(पगल्या नाल)- यह मारवाड से मेवाड़ जाने का रास्ता है।

सोमेश्वर की नाल विकट तंग दर्रा,हाथी गढ़ा की नाल कुम्भलगढ़ दुर्ग इसी के पास बना है।

सरूपघाट, देसुरी की नाल(पाली) दिवेर एवं हल्दी घाटी दर्रा(राजसमंद) आदि प्रमुख है।

आबू पर्वत से सटा हुआ उडि़या पठार आबू से लगभग 160 मी. ऊँचा है। और गुरूशिखर मुख्य चोटी के नीचे स्थित है। जेम्स टाॅड ने गुरूशिखर को सन्तों का शिखर कहा जाता है। यह हिमालय और नीलगिरी के बीच सबसे ऊँची चोटी है।

2 मध्यवर्ती अरावली प्रदेशः-

यह मुख्यतयः अजमेर जिले में फैेला है। इस क्षेत्र में पर्वत श्रेणीयों के साथ संकरी घाटियाँ और समतल स्थल भी स्थित है। अजमेर के दक्षिणी पश्चिम में तारागढ़(870 मी.) और पश्चिम में सर्पीलाकार पर्वत श्रेणीयां नाग पहाड़(795 मी.)  कहलाती है।

प्रमुख दर्रे:-

बर, परवेरियां, शिवपुर घाट, सुरा घाट, देबारी, झीलवाडा, कच्छवाली, पीपली, अनरिया आदि।

3 उतरी – पुर्वी अरावली प्रदेशः- इस क्षेत्र का विस्तार जयपुर, दौसा तथा अलवर जिले में है। इस क्षेत्र में अरावली की श्रेणीयां अनवरत न हो कर दुर – दुर हो जाती है। इस क्षेत्र में पहाड़ीयों की सामान्य ऊँचाई 450 से 700 मी. है। इस प्रदेश की प्रमुख चोटियां:-

रघुनाथगढ़(सीकर)- 1055 मी. ,खोह(जयपुर)-920 मी. , भेराच(अलवर)-792 मी. , बरवाड़ा(जयपुर)-786 मी.।

  1. पूर्वी मैदानी भाग:-

अरावली पर्वत के पूर्वी भाग और दक्षिणी-पूर्वी पठारी भाग के दक्षिणी भाग में पूर्व का मैदान स्थित है। यह मैदान राज्य के कुल क्षेत्रफल का 23.3 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में राज्य की 39 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इस क्षेत्र में – भरतपुर, अलवर, धौलपुर, करौली,

सवाईमाधोपुर, जयुपर, दौसा, टोंक, भीलवाडा तथा दक्षिण कि ओर से डुंगरपुर, बांसवाडा ओर प्रतापगढ जिलों के मैदानी भाग सम्मिलित है। यह प्रदेश नदी बेसिन प्रदेश है अर्थात नदियों द्वारा जमा कि गई मिट्टी से इस प्रदेश का निर्माण हुआ है। इस प्रदेश में कुओं द्वारा

सिंचाई अधिक होती है। इस मैदानी प्रदेश के तीन उप प्रदेश है।

1 बनास- बांणगंगा बेसीन

2 चंम्बल बेसीन

3 मध्य माही बेसीन

1 बनास- बांणगंगा बेसीनः-

बनास और इसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित यह एक विस्तृत मैदान है यह मैदान बनास और इसकी सहायक  बाणगंगा, बेड़च, डेन, मानसी, सोडरा, खारी, भोसी, मोरेल आदि नदियों द्वारा निर्मीत यह एक विस्तृत मैदान है जिसकी ढाल पूर्व की और है।

2 चम्बल बेसीनः-

इसके अन्तर्गत कोटा, सवाईमाधोपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों का क्षेत्र सम्मिलित है। कोटा का क्षेत्र हाड़ौती में सम्मिलित है किंतु यहां चम्बल का मैदानी क्षेत्र स्थित है। इस प्रदेश में सवाईमाधोपुर, करौली एवं धौलपुर में चम्बल के बीहड़ स्थित है। यह अत्यधिक कटा-

फटा क्षेत्र है, इनके मध्य समतल क्षेत्र स्थ्ति है।

3 मध्य माही बेसीन या छप्पन का मैदान:-

इसका विस्तार उदयपुर के दक्षिण पुर्व से डुंगरपुर, बांसवाडा और प्रतापगढ़ जिलों में है। माही मध्य प्रदेश से निकल कर इसी प्रदेश से गुजरती हुई खंभात कि खाडी में गिरती है। यह क्षेत्र वागड़ के नाम से पुकारा जाता है तथा प्रतापगढ़ व बांसवाड़ा के मध्य भाग में

छप्पन ग्राम समुह स्थित है। इसलिए यह भू-भाग छप्पन के मैदान के नाम से भी जाना जाता है।

4दक्षिण-पूर्व का पठारी भाग:-

राज्य के कुल क्षेत्रफल का 9.6 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में राज्य की 11 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। राजस्थान के  इस क्षेत्र में राज्य के चार जिले कोटा, बूंदी, बांरा, झालावाड़ सम्मिलित है।इस पठारी भग की प्रमुख नदी चम्बल नदी है और इसकी सहायक नदियां

पार्वती, कालीसिद्ध, परवन, निवाज, इत्यादि भी है। इस पठारी भाग की नदीयां है। इस क्षेत्र में वर्षा का औसत 80 से 100 से.मी. वार्षिक है।

राजस्थान का झालावाड़ जिला राज्य का सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला जिला है और यह राज्य का एकमात्र अति आद्र जिला है। इस क्षेत्र में मध्यम काली मिट्टी की अधिकता है। जो कपास, मूंगफली के लिए अत्यन्त उपयोगी है।

यह पठारी भाग अरावली और विध्यांचल पर्वत के बीच “सक्रान्ति प्रदेश” ( ज्तंदेपजपवदंस इमसज) है।

दक्षिणी-पूर्वी पठारी भाग को दो भागों में बांटा गया है।

1 हाडौती का पठार – कोटा, बंूदी, बांरा, झालावाड़

2 विन्ध्यन कगार भूमि – धौलपुर. करौली, सवाईमाधोपुर

राजस्थान की जलवायु

जलवायु:-

किसी क्षेत्र विषेष में एक लम्बी अवधि के दौरान मौसम की औसत अवस्था जलवायु कहलाती है।

मौसम:-

किसी क्षेत्र विषेष में छोटी अवधि के दौरान वातावरण की औरत दषा को मौसम कहा जाता है।

३जलवायु को प्रभावित करने वाले तत्व:-

  1. वायु की गति
  2. वायु में नमी/आर्द्रता
  3. तापमान
  4. वर्षा

राजस्थान की जलवायु की विषेषताएॅं:-

  1. राजस्थान की जलवायु गर्म (उष्ण) शुष्क प्रकार की है।
  1. राजस्थान के द.पूर्व में अधिक वर्षा व उतर पष्चिम में कम वर्षा होती है।
  1. राजस्थान के द.पूर्व में अधिक वर्षा उतर पूर्व की ओर क्रमशः घटती जाती है।
  1. राजस्थान में वर्षा की अनियमितता व अनिष्चितता के कारण अधिकाषतः सुखे की स्थिति बनी रहती है।

राजस्थान में जलवायु का अध्ययन करने पर तीन प्रकार की ऋतुएं पाई जाती हैः-

  1. ग्रीष्म ऋतु: (मार्च से मध्य जून तक)
  2. वर्षा ऋतु : (मध्य जून से सितम्बर तक)
  3. शीत ऋतु : (नवम्बर से फरवरी तक)

ग्रीष्म ऋतु:-

राजस्थान में मार्च से मध्य जून तक ग्रीष्म ऋतु होती है। इसमें मई व जून के महीने में सर्वाधिक गर्मी पड़ती है। इस समय राजस्थान का औरत तापमान 440C होता है किन्तु गंगानगर, चुरू व बीकानेर का तापमान 500C तक हो जाता है। अधिक गर्मी के वायु

मे नमी समाप्त हो जाती है। परिणाम स्वरूप वायु हल्की होकर उपर चली जाती है। अतः राजस्थान में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है परिणामस्वरूप उच्च वायुदाब से वायु निम्न वायुदाब की और तेजगति से आती है इससे गर्मियों में आंधियों का प्रवाह बना रहता है।

राजस्थान में 35 दिनों तक आंधियां आती है।

सर्वाधिक आंधियां गंगानगर जिले में आती है

(28 दिनों तक)

इस समय पश्चिमी राजस्थान में गर्म व षुष्क हवाये चलती है। जिन्हे “लू” कहा जाता है। पश्चिमी राजस्थान में जोधपुर जिले का “फलौदी क्षेत्र” सर्वाधिक शुष्क क्षेत्र है।

वर्षा ऋतु:-  राजस्थान में मध्य जून से सितम्बर तक वर्षा ऋतु होती है। इस समय दक्षिणी पश्चिमी मानसून से राजस्थान में वर्षा होती है।

दक्षिण पश्चिम मानसून की दो शाखाएं होती है:-

  1. अरब सागर शाखा:
  2. बंगाल की खाड़ी की शाखा:

अरब सागर की शाखा राजस्थान के समीप है किन्तु अरब सागर से आने वाला मानसून अरावली पर्वत के समान्तर होने के कारण राजस्थान से आगे निकल जाता है। इससे पश्चिमी राजस्थान में नामात्र की वर्षा होती है जबकि बंगाल की खाड़ी से आने वाला मानसून

हजारों किमी. की दूरी तय करके राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भाग पर पहंुचता है। बंगाल की खाड़ी के मानसून से राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भाग में वर्षा होती है।

राजस्थान में वर्षा का औरत 53.5 से.मी. वार्षिक है।

राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान माऊंट आबू (150 से.मी.वार्षिक) है।

सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला जिला झालावाड़ (100 से.मी वार्षिक ) है।

न्यूनतम वर्षा प्राप्त करने वाला जिला जैसलमेर (10 से.मी.वार्षिक)

शीत ऋतु:-

राजस्थान में नम्बर से फरवरी तक शीत ऋतु होती है। इन चार महीनों में जनवरी माह में सर्वाधिक सर्दी पड़ती है। इस समय राज्य का औरत तापमान 120C जाता है। गंगानगर, बीकानेर, चुरू में यह तापमान 00C जाता है। राजस्थान में सर्वाधिक ठण्डा स्थान

माऊंट आबू है जहां तापमान 00C भी नीचे चला जाता है।शीत ऋतु में भूमध्यसागर में उठने वाले चक्रवातों के कारण राजस्थान के उतरी पश्चिमी भाग में वर्षा होती है। जिसे “मावट/मावठ” कहा जाता है। यह वर्षा माघ महीने में होती है। शीतकालीन वर्षा मावट को –

गोल्डन ड्रोप (अमृत बूदे) भी कहा जाता है। यह रवि की फसल के लिए लाभदायक है।

राज्य में हवाएं प्राय पश्चिम और उतर-पश्चिम की ओर चलती है।

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🎯राजस्थान की जलवायु🎯

राजस्थान की जलवायु शुष्क से उपआर्द्र मानसूनी जलवायु है अरावली के पश्चिम में न्यून वर्षा, उच्च दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर निम्न आर्द्रता तथा तीव्रहवाओं युक्त जलवायु है। दुसरी और अरावली के पुर्व में अर्द्रशुष्क एवं उपआर्द्र जलवायु है।

🎯जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

अक्षांशीय स्थिती, समुद्रतल से दुरी, समुद्र तल से ऊंचाई, अरावली पर्वत श्रेणियों कि स्थिति एवं दिशा आदि।

🎯राजस्थान की जलवायु कि प्रमुख विशेषताएं –

शुष्क एवं आर्द्र जलवायु कि प्रधानता

अपर्याप्त एंव अनिश्चित वर्षा

वर्षा का अनायस वितरण

अधिकांश वर्षा जुन से सितम्बर तक

वर्षा की परिर्वतनशीलता एवं न्यूनता के कारण सुखा एवं अकाल कि स्थिती अधिक होना।

राजस्थान कर्क रेखा के उत्तर दिशा में स्थित है। अतः राज्य उपोष्ण कटिबंध में स्थित है। केवल डुंगरपुर और बांसवाड़ा जिले का कुछ हिस्सा उष्ण कटिबंध में स्थित है।

अरावली पर्वत श्रेणीयों ने जलवायु कि दृष्टि से राजस्थान को दो भागों में विभक्त कर दिया है। अरावली पर्वत श्रेणीयां मानसुनी हवाओं के चलने कि दिशाओं के अनुरूप होने के कारण मार्ग में बाधक नहीं बन पाती अतः मानसुनी पवनें सीधी निकल जाति है और वर्षा नहीं करा

पाती। इस प्रकार पश्चिमी क्षेत्र अरावली का दृष्टि छाया प्रदेश होने के कारण अल्प वर्षा प्राप्त करताह है।

जब कर्क रेखा पर सुर्य सीधा चमकता है तो इसकी किरणें बांसवाड़ा पर सीधी व गंगानगर जिले पर तिरछी पड़ती है। राजस्थान का औसतन वार्षिक तापमान 37 डिग्री से 38 डिग्री सेंटीग्रेड है।

🎯राजस्थान को जलवायु की दृष्टि से पांच भागों में बांटा है।

शुष्क जलवायु प्रदेश(0-20 सेमी.)

अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश(20-40 सेमी.)

उपआर्द्र जलवायु प्रदेश(40-60 सेमी.)

आर्द्र जलवायु प्रदेश(60-80 सेमी.)

अति आर्द्र जलवायु प्रदेश(80-100 सेमी.)

🎯राजस्थान की जलवायु

  1. शुष्क प्रदेश

क्षेत्र – जैसलमेर, उत्तरी बाड़मेर, दक्षिणी गंगानगर तथा बीकानेर व जोधपुर का पश्चिमी भाग। औसत वर्षा – 0-20 सेमी.।

  1. अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – चुरू, गंगानगर, हनुमानगढ़, द. बाड़मेर, जोधपुर व बीकानेर का पूर्वी भाग तथा पाली, जालौर, सीकर,नागौर व झुझुनू का पश्चिमी भाग।

औसत वर्षा – 20-40 सेमी.।

  1. उपआर्द्ध जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – अलवर, जयपुर, अजमेर, पाली, जालौर, नागौर व झुझुनू का पूर्वी भाग तथा टोंक, भीलवाड़ा व सिरोही का उत्तरी-पश्चिमी भाग।

औसत वर्षा – 40-60 सेमी.।

  1. आर्द्र जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – भरतपुर, धौलपुर, कोटा, बुंदी, सवाईमाधोपुर, उ.पू. उदयपुर, द.पू. टोंक तथा चित्तौड़गढ़।

औसत वर्षा – 60-80 सेमी.।

  1. अति आर्द्र जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – द.पू. कोटा, बारां, झालावाड़, बांसवाडा, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, द.पू. उदयपुर तथा माउण्ट आबू क्षेत्र।

औसत वर्षा – 80-100 सेमी.।

🎯तथ्य

राजस्थान के सबसे गर्म महिने मई – जुन है तथा ठण्डे महिने दिसम्बर – जनवरी है।

राजस्थान का सबसे गर्म व ठण्डा जिला – चुरू

राजस्थान का सर्वाधिक दैनिक तापान्तर पश्चिमी क्षेत्र में रहता है।

राजस्थान का सर्वाधिक दैनिक तापान्तर वाला जिला -जैसलमेर

राजस्थान में वर्षा का औसत 57 सेमी. है जिसका वितरण 10 से 100 सेमी. के बीच होता है। वर्षा का असमान वितरण अपर्याप्त और अनिश्चित मात्रा हि राजस्थान में हर वर्ष सुखे व अकाल का कारण बनती है।

राजस्थान में वर्षा की मात्रा दक्षिण पूर्व से उत्तर पश्चिम की ओर घटती है। अरब सागरीय मानसुन हवाओं से राज्य के दक्षिण व दक्षिण पूर्वी जिलों में पर्याप्त वर्षा हो जाती है।

राज्य में होने वाली वर्षा की कुल मात्रा का 34 प्रतिशत जुलाई माह में, 33 प्रतिशत अगस्त माह में होती है।

जिला स्तर पर सर्वाधिक वर्षा – झालावाड़(100 सेमी.)

जिला स्तर पर न्यूनतम वर्षा – जैसलमेर(10 सेमी.)

राजस्थान में वर्षा होने वाले दिनों की औसत संख्या 29 है।

वर्षा के दिनों की सर्वाधिक संख्या – झालावाड़(40 दिन), बांसवाड़ा(38 दिन)

वर्षा के दिनों की न्यूनतम संख्या – जैसलमेेर(5 दिन)

राजस्थान का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान – माउण्ट आबु(120-140 सेमी.) है यहीं पर वर्षा के सर्वाधिक दिन(48 दिन) मिलते हैं।

वर्षा के दिनों की संख्या उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व की ओर बढ़ती है।

राजस्थान में सबसे कम आर्द्रता – अप्रैल माह में

राजस्थान मे सबसे अधिक आर्द्रता – अगस्त माह में

राजस्थान में सबसे सम तापमान – अक्टुबर माह में रहता है।

सबसे कम वर्षा वाला स्थान – सम(जैसलमेर) 5 सेमी.

राजस्थान को 50 सेमी. रेखा दो भागों में बांटती है। 50 सेमी. वर्षा रेखा की उत्तर-पश्चिम में कम होती है। जबकि दक्षिण पूर्व में वर्षा अधिक होती है।

यह 50 सेमी. मानक रेखा अरावली पर्वत माला को माना जाता है।

राजस्थान में सर्वाधिक आर्द्रता वाला जिला झालावाड़ तथा न्यूनतम जिला जैसलमेर है। राजस्थान में सर्वाधिक आर्द्रता वाला स्थान माउण्ट आबू तथा कम आर्द्रता फलौदी(जोधपुर) है।

राजस्थान में सर्वाधिक ओलावृष्टि वाला महिना मार्च-अप्रैल है तथा सर्वाधिक ओलावृष्टि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में होती है तथा सर्वाधिक ओलावृष्टि वाला जिला जयपुर है।

राजस्थान में हवाऐं पाय पश्चिम व दक्षिण पश्चिम की ओर चलती है।

हवाओं की सर्वाधिक गति – जून माह

हवाओं की मंद गति – नवम्बर माह

ग्रीष्म ऋतु में पश्चिम क्षेत्र क्षेत्र का वायुदाब पूर्वी क्षेत्र से कम होता है।

ग्रीष्म ऋतु में पश्चिम की तरफ से गर्म हवाऐं चलती है जिन्हें लू कहते है। इस लू के कारण यहां निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। इस निम्न वायुदाब की पूर्ती हेतु दुसरे क्षेत्र से (उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों से) तेजी से हवा उठकर आती है जो अपने साथ धुल व मिट्टी

उठाकर ले आती है इसे ही आंधी कहते हैं।

आंधियों की सर्वाधिक संख्या – श्रीगंगानगर(27 दिन)

आंधियों की न्यूनतम संख्या – झालावाड़ (3 दिन)

राजस्थान के उत्तरी भागों में धुल भरी आधियां जुन माह में और दक्षिणी भागों में मई माह में आति है।

राजस्थान में पश्चिम की अपेक्षा पूर्व में तुफान(आंधी + वर्षा) अधिक आते है।

🎯आर्द्रता

वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते है। आपेक्षिक आर्द्रता मार्च-अप्रैल में सबसे कम व जुलाई-अगस्त में सर्वाधिक होती है।

🎯लू____

मरूस्थलीय भाग में चलने वाली शुष्क व अति गर्म हवाएं लू कहलाती है।

समुद्र तल से ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है। इसके घटने की यह सामान्य दर 165 मी. की ऊंचाई पर 1 डिग्री से.ग्रे. है।

राजस्थान के उत्तरी-पश्चिमी भाग से दक्षिणी-पुर्वी की ओर तापमान में कमी दृष्टि गोचर होती है।

🎯तथ्यडा.ब्लादीमीर कोपेन, ट्रिवार्था, थार्नेवेट के जलवायु वर्गीकरण के अनुसार राजस्थान को 4 जलवायु प्रदेशों में बांटा गया।

Aw उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु प्रदेश

BShw अर्द्ध शुष्क कटिबंधीय शुष्क जलवायु प्रदेश

BWhw उष्ण कटिबंधीय शुष्क जलवायु प्रदेश

Cwgउप आर्द्र जलवायु प्रदेश

🎯राजस्थान को कृषि की दृष्टि से निम्न लिखित दस जलवायु प्रदेशों में बांटा गया है।

1.शुष्क पश्चिमी मैदानी

2.सिंचित उत्तरी पश्चिमी मैदानी

3.शुष्क आंशिक सिंचित पश्चिमी मैदानी

4.अंन्त प्रवाही

5.लुनी बेसिन

6.पूर्वी मैदानी(भरतपुर, धौलपुर, करौली जिले)

7.अर्द्र शुष्क जलवायु प्रदेश

8.उप आर्द्र जलवायु प्रदेश

9.आर्द्र जलवायु प्रदेश

10.अति आर्द्र जलवायु प्रदेश

🎯राजस्थान में जलवायु का अध्ययन करने पर तीन प्रकार की ऋतुएं पाई जाती हैः-

ग्रीष्म ऋतु: (मार्च से मध्य जून तक)

वर्षा ऋतु : (मध्य जून से सितम्बर तक)

शीत ऋतु : (नवम्बर से फरवरी तक)

🎯ग्रीष्म ऋतु_____

राजस्थान में मार्च से मध्य जून तक ग्रीष्म ऋतु होती है। इसमें मई व जून के महीने में सर्वाधिक गर्मी पड़ती है। अधिक गर्मी के वायु मे नमी समाप्त हो जाती है। परिणाम स्वरूप वायु हल्की होकर उपर चली जाती है। अतः राजस्थान में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है

परिणामस्वरूप उच्च वायुदाब से वायु निम्न वायुदाब की और तेजगति से आती है इससे गर्मियों में आंधियों का प्रवाह बना रहता है।

🎯वर्षा ऋतु

राजस्थान में मध्य जून से सितम्बर तक वर्षा ऋतु होती है।

🎯राजस्थान में 3 प्रकार के मानसूनों से वर्षा होती है।

  1. बंगाल की खाड़ी का मानसून

यह मानसून राजस्थान में पूर्वी दिशा से प्रवेश करता है। पूर्वी दिशा से प्रवेश करने के कारण मानसूनी हवाओं को पूरवइयां के नाम से जाना जाता है यह मानसून राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा करवाता है इस मानसून से राजस्थान के उत्तरी, उत्तरी-पूर्वी, दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्रों में वर्षा

होती है।

  1. अरब सागर का मानसून

यह मानसून राजस्थान के दक्षिणी-पश्चिमी दिशा से प्रवेश करता है यह मानसून राजस्थान में अधिक वर्षा नहीं कर पाता क्योंकि यह अरावली पर्वतमाला के समान्तर निकल जाता है। राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का विस्तार दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व कि ओर है यदि

राज्य में अरावली का विस्तार उत्तरी-पश्चिमी से दक्षिणी-पूर्व कि ओर होता तो राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्र में वर्षा होती।

राजस्थान में सर्वप्रथम अरबसागर का मानसून प्रवेश करता है

  1. भूमध्यसागरीय मानसून

यह मानसून राजस्थान में पश्चिमी दिशा से प्रवेश करता है। पश्चिमी दिशा से प्रवेश करने के कारण इस मानसून को पश्चिमी विक्षोभों का मानसून के उपनाम से जाना जाता है। इस मानसून से राजस्थान में उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में वर्षा होती है। यह मानसून मुख्यतः सर्दीयों में

वर्षा करता है सर्दियों में होने वाली वर्षा को स्थानीय भाषा में मावठ कहते हैं यह वर्षा गेहुं की फसल के लिए सर्वाधिक लाभदायक होती है। इन वर्षा कि बूदों को गोल्डन ड्रोप्स या सोने कि बुंद के उप नाम से जाना जाता है।

🎯शीत ऋतु

राजस्थान में नम्बर से फरवरी तक शीत ऋतु होती है। इन चार महीनों में जनवरी माह में सर्वाधिक सर्दी पड़ती है।शीत ऋतु में भूमध्यसागर में उठने वाले चक्रवातों के कारण राजस्थान के उतरी पश्चिमी भाग में वर्षा होती है। जिसे “मावट/मावठ” कहा जाता है। यह वर्षा

माघ महीने में होती है। शीतकालीन वर्षा मावट को – गोल्डन ड्रोप (अमृत बूदे) भी कहा जाता है। यह रबी की फसल के लिए लाभदायक है।

राज्य में हवाएं प्राय पश्चिम और उतर-पश्चिम की ओर चलती है।

🎯वर्षा

राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा दक्षिणी-पश्चिमी मानसून हवाओं से होती है तथा दुसरा स्थान बंगाल की खाड़ी का मानसून, तीसरा स्थान अरबसागर के मानसून, अन्तिम स्थान भूमध्यसागर के मानसून का है।

🎯आंधियों के नाम

💥उत्तर की ओर से आने वाली – उत्तरा, उत्तराद, धरोड, धराऊ

💥दक्षिण की ओर से आने वाली – लकाऊ

💥पूर्व की ओर से आने वाली – पूरवईयां, पूरवाई, पूरवा, आगुणी

💥पश्चिम की ओर से आने वाली – पिछवाई, पच्छऊ, पिछवा, आथूणी।

💥अन्य

उत्तर-पूर्व के मध्य से – संजेरी

पूर्व-दक्षिण के मध्य से – चीर/चील

दक्षिण-पश्चिम के मध्य से – समंदरी/समुन्द्री

उत्तर-पश्चिम के मध्य से – सूर्या

🎯दैनिक गति/घुर्णन गति

पृथ्वी अपने अक्ष पर 23 1/2 डिग्री झुकी हुई है। यह अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व 1610 किमी./घण्टा की चाल से 23 घण्टे 56 मिनट और 4 सेकण्ड में एक चक्र पुरा करती है। इस गति को घुर्णन गति या दैनिक गति कहते हैं इसी के कारण दिन रात होते हैं।

🎯वार्षिक गति/परिक्रमण गति

पृथ्वी को सूर्य कि परिक्रमा करने में 365 दिन 5 घण्टे 48 मिनट 46 सैकण्ड लगते हैं इसे पृथ्वी की वार्षिक गति या परिक्रमण गति कहते हैं। इसमें लगने वाले समय को सौर वर्ष कहा जाता है। पृथ्वी पर ऋतु परिर्वतन, इसकी अक्ष पर झुके होने के कारण तथा सूर्य के

सापेक्ष इसकी स्थिति में परिवर्तन यानि वार्षिक गति के कारण होती है। वार्षिक गति के कारण पृथ्वी पर दिन रात छोटे बड़े होते हैं।

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 21 मार्च एवम् 23 सितम्बर को सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं फलस्वरूप सम्पूर्ण पृथ्वी पर रात-दिन की अवधि बराबर होती है।

🎯घुर्णन गति&परिक्रमण गति

💥विषुव

जब सुर्य की किरणें भुमध्य रेखा प सीधी पड़ती है तो इस स्थिति को विषुव कहा जाता है। वर्ष में दो विषुव होते हैं।

21 मार्च को बसन्त विषुव तथा 23 सितम्बर को शरद विषुव होते हैं

💥आयन

23 1/2 उत्तरी अक्षांश से 23 1/2 दक्षिणी अक्षांश के मध्य का भु-भाग जहां वर्ष में कभी न कभी सुर्य की किरणें सीधी चमकती है आयन कहलाता है यह दो होते हैं।

उत्तरी आयन(उत्तरायण) – 0 अक्षांश से 23 1/2 उत्तरी अक्षांश के मध्य।

दक्षीण आयन(दक्षिणायन) – 0 अक्षांश से 23 1/2 दक्षिणी अक्षांश के मध्य।

💥आयनान्त

जहां आयन का अन्त होता है। यह दो होते हैं

उत्तरीआयन का अन्त(उत्तरयणान्त) – 23 1/2 उत्तरी अक्षांश/कर्क रेखा पर 21 जुन को उत्तरी आयन का अन्त होता है।

दक्षिणी आयन का अन्त – 23 1/2 दक्षिणी अक्षांश/मकर रेखा पर 22 दिसम्बर को दक्षिणाअन्त होता है।

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 21 जून को कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् रहती है फलस्वरूप उत्तरी गोलार्द्ध में दिन बड़े व रातें छोटी एवम् ग्रीष्म ऋतु होती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में सुर्य की किरणें तीरछी पड़ने के कारण दिन छोटे रातें बड़ी व शरद ऋतु होती है।

🎯तथ्य______

उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे बड़ा दिन – 21 जुन

दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे बड़ी रात – 21 जुन

उत्तरी गोलार्द्ध की सबसे छोटी रात – 21 जुन

दक्षिणी गोलार्द्ध का सबसे छोटा दिन – 21 जुन

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर सुर्य की किरणें लम्बवत् रहती है फलस्वरूप दक्षिण गोलार्द्ध में दिन बड़े, रातें छोटी एवम् ग्रीष्म ऋतु होती है जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में सुर्य कि किरणें तीरछी पड़ने के कारण दिन छोटे, रातें बड़ी व शरद ऋतु होती

है।

🎯तथ्य______

दक्षिणी गोलार्द्ध का सबसे बड़ा दिन – 22 दिसम्बर

उत्तरी गोलार्द्ध की सबसे बड़ी रात – 22 दिसम्बर

दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे छोटी रात – 22 दिसम्बर

उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे छोटा दिन – 22 दिसम्बर

🎯कटिबन्ध_______

कोई भी दो अक्षांश के मध्य का भु-भाग कटिबंध कहलाता है।

🎯गोर___

कोई भी दो देशान्तर के मध्य का भु-भाग गोर कहलाता है।

भारत दो कटिबन्धों में स्थित है।

उष्ण कटिबंध और शीतोष्ण कटिबंध

राजस्थान उष्ण कटिबंध के निकट वास्तव में उपोष्ण कटिबंध में स्थित है।

🎯मानसून____

मानसून शब्द की उत्पति अरबी भाषा के मौसिन शब्द से हुई है। जिसका शाब्दिक अर्थ ऋतु विशेष में हवाओं की दिशाएं होता है।

गीष्मकालीन/दक्षिणी पश्चिमी मानसून

गर्मियों में जब उत्तरी गोलार्द्ध में सूय्र की किरणें सीधी पड़ती है। तो यहां निम्न वायुदाब क्षेत्र बनता है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में सुर्य की किरणें तीरछी पड़ने के कारण शीत ऋतु होती है और वायुदाब उच्च रहता है। इसलिए हवाऐं दक्षिणी गोलार्द्ध से उत्तरी गोलार्द्ध की ओर

चलती है।

भारत की स्थिति प्रायद्वीपीय होने के कारण दक्षिण पश्चिम से आने वाली यह मानसूनी पवनें दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है।

  1. अरब सागरीय शाखा 2. बंगाल की खाड़ी शाखा

भारत में सर्वप्रथम मानसून की अरब सागरीय शाखा सक्रिय होती है। औसतन 1 जुन को मालाबार तट केरल पर ग्रीष्म कालीन मानसून की अरब सागरीय शाखा सक्रिय होती है।

🎯नोट_____

भारत में ग्रीष्म कालीन मानसून सर्वप्रथम अण्डमान निकोबार द्वीपसमुह(ग्रेट निकोबार, इंदिरा प्वांइट) पर सक्रिय होता है।

राजस्थान में सर्वप्रथम ग्रीष्मकालीन मानसून की अरब सागरीय शाखा ही सक्रिय होती है।

भारत एवम् राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा ग्रीष्मकालीन मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा से होती है।

शीतकालीन मानसून से कोरोमण्डल तट तमिलनाडू में हि वर्षा होती है। शीतकालीन मानसून से सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला देश – चीन।

🎯तथ्य______

विश्व का सबसे गर्म स्थान – अल-अजीजिया(लिबिया) सहारा मरूस्थल

भारत का सबसे गर्म राज्य – राजस्थान

भारत का सबसे गर्म स्थान – फलौदी(जोधपुर)

राजस्थान का सबसे गर्म जिला – चुरू

राजस्थान का सबसे गर्म स्थान – फलौदी(जोधपुर)

विश्व का सबसे ठण्डा स्थान – बखोयांस(रूस)

भारत का सबसे ठण्डा राज्य – जम्मू-कश्मीर

भारता का सबसे ठ

राजस्थान की महिला सन्त

राजस्थान की महिला सन्त

मीराबाई –

इनका जन्म मेड़ता ठिकाने के कुडकी गाँव में हुआ था। इनका जन्म का नाम प्रेमल था। इनके पिता राठौड़ वंश के रत्नसिंह थे। इनका विवाह राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ था। देवर विक्रमादित्य द्वारा पति व श्वसुर की मृत्यु के बाद अनेक कष्ट दिये। मीरा

पुष्कर होते हुए वृन्दावन की गई जहाँ उन्होंने रूप गोस्वामी के सानिध्य में कृष्ण भक्ति की। किवदन्ती के अनुसार 1540 में द्वारका स्थित रद्दोड़ की मूर्ति में लीन हो गई।

करमेती बाई:

यह खण्डेला के राज पुरोहित पशुराम काथडिया की बेटी थी। विवाह के पश्चात् विदा होने से पूर्व रात्रि में कृष्ण भक्ति में लीन होने के कारण वृन्दावन चली गई। खण्डेला के ठाकुर ने इनकी स्मृति में ठाकुर बिहारी मन्दिर का निर्माण करवाया।

फूली बाई –

जोधपुर के मानजवास गाँव की आजीवन विवाह नहीं किया। जोधपुर महाराज जसवन्त सिंह की समकालीन थी। स्त्री शिक्षा व उदार में विशेष योगदान दिया।

समान बाई –

अलवर के माहुन्द गाँव की निवासी थी। भक्त रामनाथ की पुत्री थी। इन्होंने आजीवन अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर रखी तथा अन्य किसी को देखना नही चाहती थी। इन्होंने राधा-कृष्ण के मुक्तक पद्यों की रचना की।

रानी रूपा देवी –

राजमहलों से बनी महिला सन्त यह बालबदरा की पुत्री थी तथा धार्मिक संस्कारों में पली थी। यह मालानी के राव भाटी की शिष्या थी तथा निर्गुण सन्त परम्परा में प्रमुख थी। इन्होंने अलख को अपना पति माना था तथा ईश्वर के निराकार रूप की स्तुति की। यह मीरा

दादू व कबीर की प्ररवीति थी। यह तोरल जेसल देवी के रूप में पूजी जाती है।

भोली गुर्जरी –

करौली जिले के बुग्डार गाँव की निवासी, कृष्ण के मदन मोहन स्वरूप की उपासक थी। दूध बेचकर जीवनयापन करती थी। कृष्ण भक्ति से चमत्कार करती थी।

दया बाई –

यह कोटकासिम के डेहरा गाँव की निवासी थी। संत चरणदास के चाचा केशव की पुत्री थी। यह माँ से कथा सुनने के बाद कृष्ण भक्ति में लीन होती गई और विवाह ना करके संत चरणदास की शरण में चली गई। इन्होंने ‘‘दयाबोध’’ नामक ग्रन्थ की रचना की।

कर्मठी बाई –

बांगड क्षेत्र के पुरोहितपुर के काथरिया पुरूषोत्तम की पुत्री थी। यह गोस्वामी हित हरिवंश की शिष्या तथा अकबर की समकालीन थी। इन्होंने अपना अधिकांश समय वृन्दावन में बिताया।

महात्मा भूरी बाई –

सरदारगढ़ (उदयपुर) की निवासी थी। इनका 13 वर्ष की अल्पायु में नाथद्वारा के धनी व 23 वर्ष फतेहलाल से विवाह हुआ था, रोगी पति की सेवा करते-करते बैरागी होती चली गई। देवगढ़ की मुस्लिम नूरा बाई से मिलने पर इन्होंने वैराग्य ले लिया।

रानी अनूप कंवरी –

किशनगढ़ नरेश कल्याण सिंह की बुआ, सलेमाबाद के ब्रज शरणाचार्य निम्बार्क सम्प्रदाय के पीठाधिकारी की समकालीन थी। आजीवन वृन्दावन में रही। इन्होंने ब्रज व राजस्थानी भाषाओं में कृष्ण श्रृंगार व लीला पर अनेक पदों की रचना की।

ज्ञानमती बाई –

यह चरणदास की शिष्य आत्माराम इकंगी की शिष्या थी। इनका कार्यक्षेत्र जयपुर का गणगौरी मोहल्ला था।

जनखुशाती –

यह चरणदास जी के शिष्य अरखेराम की शिष्या थी। इन्होंने साधु महिमा तथा बधुविलास नामक ग्रन्थों की रचना की थी।

राणा बाई –

हरनावा गाँव के जालिम जाट की पुत्री थीं पालडी के संत चर्तुदास की शिष्या थी। इन्होंने जीवित समाधि ली थी।

गवरी बाई

इनका जन्म नागर ब्राह्मण परिवार में डूंगरपुर में 1815 में हुआ था। इनका 5-6 वर्ष की आयु में विवाह हो गया था। इन्होंने इनके लिए बालमुकुन्द मन्दिर का निर्माण करवाया। इनको मीरा का अवतार माना जाता था।

राजस्थान के लोक सन्त

राजस्थान के महिला लोक सन्त

  1. करमेती बाई –

यह खण्डेला के राजपुरोहित पशुराम काथडिया की बेटी थी। विवाह के पश्चात् विदा होने से पूर्व रात्रि में कृष्ण

भक्ति में लीन होने के कारण वृन्दावन चली गई। घुड़सवारों से बचने के लिए मृतक ऊँट

के पेट के खोल में जा छिपी। वृन्दावन के

ब्रह्मकुण्ड में आजीवन कृष्ण की भक्ति करती है। खण्डेला के ठाकुर ने इनकी स्मृति में ठाकुर बिहारी मन्दिर का निर्माण करवाया।

  1. सहजो बाई –

संत चरणदास  की शिष्या सहजो बाई ने सहज प्रकाश

सोलह तिथी शब्दवाणी आदि की रचना की।

यह शिक्षित थी।

  1. करमा बाई –

अलवर के गढीसामोर की विधवा ने आजीवन कृष्ण भक्ति में सिद्धाअवस्था प्राप्त की।

  1. फूली बाई –

जोधपुर के मानजवास गाँव की आजीवन विवाह नहीं किया। जोधपुर महाराज जसवन्त सिंह की समकालीन थी। स्त्री शिक्षा व उदार में विशेष योगदान दिया।

  1. समान बाई –

अलवर के माहुन्द गाँव की निवासी थी। भक्त रामनाथ

की पुत्री थी। इन्होंने आजीवन अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर रखी तथा अन्य किसी को देखना नही चाहती थी। इन्होंने राधा-कृष्ण के मुक्तक पद्यों की रचना की।

  1. भोली गुर्जरी –

करौली जिले के बुग्डार गाँव की निवासी, कृष्ण के मदन

मोहन स्वरूप की उपासक थी। दूध बेचकर जीवनयापन करती थी। कृष्ण भक्ति से चमत्कार करती थी।

  1. दया बाई –

यह कोटकासिम के डेहरा गाँव की निवासी थी। संत

चरणदास के चाचा केशव की पुत्री थी। यह माँ से कथा सुनने के बाद कृष्ण भक्ति में लीन होती गई। और विवाह ना करके संत चरणदास की शरण में चली गई। इन्होंने

‘‘दयाबोध’’ नामक ग्रन्थ की रचना की।इनकी मृत्यु बिठुर में हुई थी।

8.ताज बेगम –

फतेहपुर में कायमखानी नवाब कदम खाँ की शहजादी कृष्ण उपासिका थी।

  1. महात्मा भूरी बाई –

सरदारगढ़ (उदयपुर) की निवासी थी। इनका 13 वर्ष

की अल्पायु में नाथद्वारा के धनी व 23 वर्ष फतेहलाल से विवाह हुआ था, रोगी पति की सेवा करते-करते

बैरागी होती चली गई। देवगढ़ की मुस्लिम नूरा बाई से मिलने पर इन्होंने वैराग्य ले लिया। इनका कपासन के सूफी सन्त दीवान शाह से काफी सम्पर्क रहा।

  1. ज्ञानमती बाई –

यह चरणदास की शिष्य आत्माराम

इकंगी की शिष्या थी। इनका कार्यक्षेत्र जयपुर का गणगौरी मोहल्ला था।

  1. जनखुशाती –

यह चरणदास जी के शिष्य अरखेराम की शिष्या थी। इन्होंने साधु महिमा तथा बधुविलास नामक

ग्रन्थों की रचना की थी।

  1. गंगाबाई –

गोस्वामी विट्ठलदास की शिष्या थी। कृष्ण वात्सल्य भाव

को भक्ति में प्रधानता दी। गोस्वामी हरिराय के पश्चात्

गंगा बेटी का नाम कृष्ण भक्ति में प्रसिद्ध है।

  1. राणा बाई –

हरनावा गाँव के जालिम जाट की पुत्री थीं पालडी के संत चर्तुदास की शिष्या थी। इन्होंने जीवित समाधि ली थी। इनके द्वारा…… भिक्षा में रखने का नियम बनाया था।

  1. गवरी बाई –

इनका जन्म नागर ब्राह्मण परिवार में डूंगरपुर में हुआ था। इनका 5-6 वर्ष की आयु में विवाह हो गया था। इन्होंने

इनके लिए बालमुकुन्द मन्दिर का निर्माण करवाया। इनको मीरा का अवतार माना जाता था। जन्म 1815 राजस्थान की दूसरी मीरा।

  1. मीराबाई –

इनका जन्म मेड़ता ठिकाने के कुडकी गाँव में हुआ था। इनका जन्म का नाम प्रेमल था। इनके पिता राठौड़ वंश के रत्नसिंह और माता वीरकुंवरी थी। इनकी माता की मृत्यु के पश्चात् दादा रावदुदा मेड़ता लेकर चले गये।

इनको प. गजाधर ने शिक्षित किया था। इनका विवाह राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ था। ये

कर्मावती हाड़ी के पुत्र थे। देवर विक्रमादित्य द्वारा पति व श्वसुर की मृत्यु के बाद अनेक कष्ट दिये। मीरा पुष्कर होते हुए वृन्दावन की गई जहाँ उन्होंने रूप गोस्वामी के सानिध्य में कृष्ण भक्ति की। किवदन्ती के अनुसार 1540 में द्वारका स्थित रद्दोड़ की मूर्ति में लीन हो

गई। इनके द्वारा प्रमुख ग्रन्थ –गीत गोविन्द टीका, नरसी जी का मायरा, रूकमणी हरण, मीरा की गरीबी, राग गोविन्द आदि है। मीरा के स्फुट पद वर्तमान में मीरा पदावली के नाम से जाने जाते हैं। मीरा के दादा ने मेड़ता में मीरा के लिए चारभुजा नाथ जी का मन्दिर

बनवाया था। इनके श्वसुर ने कुभशाह मन्दिर के पास कुंवरपदे महल बनवाया था।

  1. रानी रूपा देवी –

राजमहलों से बनी महिला सन्त यह बालबदरा की पुत्री थी तथा धार्मिक संस्कारों में पली थी। यह मालानी के राव

भाटी की शिष्या थी तथा निर्गुण सन्त परम्परा में प्रमुख थी। इन्होंने अलख को अपना पति माना था तथा ईश्वर के

निराकार रूप की स्तुति की। इन्होंने बाल सखा धारू मेघवाल के साथ समाज के अछूत वर्ग मेघवाल में भक्ति की व जागृति फैलाई। यह मीरा दादू व कबीर की प्ररवीति थी। यह तोरल जेसल देवी के रूप में पूजी जाती है।

  1. रानी रत्नावती –

आमेर नरेश राजा मानसिंह के अनुज भानगढ़ नरेश

राजा माधोसिंह की पत्नी थी। यह कृष्ण पे्रम उपासिका थी। इनका पुत्र पे्रमसिंह (छत्रसिंह) नृसिंह अवतार के रूप में शिव का उपासक था।

  1. रानी अनूप कंवरी –

किशनगढ़ नरेश कल्याण सिंह की बुआ, सलेमाबाद के ब्रज शरणाचार्य निम्बार्क सम्प्रदाय के पीठाधिकारी की समकालीन थी। आजीवन वृन्दावन में रही। इन्होंने ब्रज व

राजस्थानी भाषाओं में कृष्ण श्रृंगार व लीला पर अनेक पदों की रचना की। यह कृष्ण के बंशीधर व नटनागर की उपासक थी। प्रताह सिंह की रानी फतेह

कुंवरी भी वृन्दावन भी रही।

राजस्थान के पुरूष लोक सन्त और सम्प्रदाय

  1. रामस्नेही सम्प्रदाय –

इसके प्रवर्तक संत रामचरण दास जी थे। इनका जन्म टोंक जिले के सोड़ा गाँव में हुआ था। इनके मूल गाँव का नाम बनवेडा था। इनके पिता बखाराम व माता देऊजी थी तथा वैश्य जाति के थे। इन्होंने यहाँ जयपुर महाराज के

यहाँ मंत्री पद पर कार्य किया था। इसका मूल रामकिशन था। दातंडा (मेवाड़) के गुरू कृपाराम से दीक्षा ली थी। इनके द्वारा रचित ग्रन्थ अर्ण वाणी है। इनकी मृत्यु शाहपुरा (भीलवाड़ा) में हुई थी। जहाँ इस सम्प्रदाय की मुख्यपीठ है। पूजा स्थल रामद्वारा कहलाते हैं तथा

इनके

पुजारी गुलाबी की धोती पहनते हैं। ढाढी-मूंछ व सिर पर बाल नहीं रखते है। मूर्तिपुजा नहीं करते थे। इसके 12 प्रधान शिष्य थे जिन्होंने सम्प्रदायक प्रचार व प्रसारकिया।

रामस्नेही सम्प्रदाय की अन्य तीन पीठ

  1. सिंहथल बीकानेर, प्रवर्तक – हरिदास जी
  2. रैण (नागौर) प्रवर्तक – दरियाआब जी (दरियापथ)
  3. खेडापा (जोधपुर) प्रवर्तक संतरामदासजी
  1. दादू सम्प्रदाय –

प्रवर्तक – दादूदयाल,

जन्म गुजरात के अहमदाबाद में, शिक्षा दीक्षा – संत बुद्धाराम से, 19 वर्ष की आयु में राजस्थान में प्रवेश राज्य में सिरोही, कल्याणपुर, अजमेर, सांभर व आमेर में भ्रमण करते हुए नरैणा (नारायण) स्थान पर पहुँचे

जहाँ उनकी भेंट अकबर से हुई थी। इसी स्थान पर इनके चरणों का मन्दिर बना हुआ है। कविता के रूप में संकलित इनके ग्रन्थ दादूबाडी तथा दादूदयाल जी दुहा कहे जाते हैं। इनके प्रमुख सिद्धान्त मूर्तिपुजा का विरोध, हिन्दू मुस्लिम एकता शव को न जलाना व दफनाना

तथा उसे जंगली जानवरों के लिए खुला छोड़ देना, निर्गुण ब्रह्मा उपासक है। दादूजी के शव को भी भराणा नामक

स्थान पर खुला छोड़ दिया गया था। गुरू को बहुत अधिक  महत्व देते हैं। तीर्थ यात्राओं को ढकोसला मानते हैं।

(अ) खालसा –

नारायण के शिष्य परम्परा को मानने वाले खालसा कहलाते थे। इसके प्रवर्तक गरीबदास जी थे।

(ब) विखत –

घूम-घूम कर दादू जी के उपदेशों को गृहस्थ जीवन तक पहुँचाने वाले।

(स) उतरादेय –

बनवारी दास द्वारा हरियाणा अर्थात् उत्तर दिशा में

जाने के कारण उतरादेय कहलाये।

(द) खारवी –

शरीर पर व लम्बी- लम्बी जटाएँ तथा छोटी-

छोटी टुकडि़यों में घूमने वाले।

(य) नागा –

सुन्दरदास जी के शिष्य नागा कहलाये।

दादू जी के प्रमुख शिष्य –

  1. बखना जी –

इनका जन्म नारायणा में हुआ था। ये संगीत विद्या में निपुण थे। इनको हिन्दू व मुसलमान दोनों मानते थे।

इनके पद व दोहे बरचना जी के वाणी में संकलित थे।

  1. रज्जब जी –

जाति – पठान, जन्म – सांगानेर, दादू जी से भेंट आमेर में तथा उनके शिष्य बनकर विवाह ना करने की कसम

खाई। दादू की मृत्यु पर अपनी आखें बद कर ली व स्वयं के मरने तक आँखें नहीं खोली। ग्रन्थ वाणी व सर्ववंगी।

  1. गरीबदास जी –

दादू जी ज्येष्ठ पुत्र तथा उत्तराधिकारी।

  1. जगन्नाथ –

कायस्थ जाति के, इनके ग्रन्थ वाणी व गुण गंजनाम।

  1. सुन्दरदास जी –

दौसा में जन्मे, खण्डेलवाल वैश्य जाति के थे। 8 वर्ष की आयु में दादू जी के शिष्य बने व आजीवन रहे।

  1. रामानन्दी सम्प्रदाय –

ये वैष्णव सम्प्रदाय से संबंधित है। इसकी प्रथा पीठ

गलता (जयपुर) में है। इसे उतरतोदादरी भी कहा जा। इसके प्रवर्तक रामानन्द जी थे जिनके कबीर शिष्य थे

इनके शिष्य कृष्णचन्द प्यहारी (आमेर) थे जिन्होंने इस क्षेत्र में नाथ सम्प्रदाय के प्रभाव को कम कर रामानुज सम्प्रदाय का प्रभाव स्थापित किया। गलता तीर्थ में राम-सीता को युगल सरकार के रूप में मार्धुय भाव में पूजा जाता है इसमें राम को सर्गुण रूप से पूजा जाता

था।

  1. जसनाथी सम्प्रदाय –

प्रवर्तक संत जसनाथ जी थे जो महान पर्यावरणविद्ध

भी थे इनका जन्म कतरियासर (बीकानेर) में हुआ। ये नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। इनका जन्म हमीर जाट के यहाँ हुआ था। इनके अधिकांश अनुयायी जाट जाति के

लोग है जो बीकानेर गंगानगर, नागौर, चुरू आदि जिलो में थे। ये गले में काली उन का धाना बांधते हैं। इनके प्रमुख ग्रन्थ सिंह भूदना तथा कोण्डों थे। इन्होंने अपने अनुयायियों को 36 नियमों का पालन करने को कहा था। ये अत्यन्त प्रकृति प्रेमी थे। इनके अनुयायी रात्रि

जागरण, अग्नि नृत्य करते हैं तथा निर्गुण भ्रम की उपासना करते थे। जीव हत्या का विरोध, तथा जीव भ्रम एकता का समर्थन किया। कतरियासर में प्रतिवर्ष अश्विन शुक्ल सप्तमी में मेला भरता है।

  1. जाम्भो जी सम्प्रदाय –

पंवार राजपूत जाम्भो जी का जन्म नागौर जिले के

पीपासर गाँव में हुआ था। इनके पिता लोहट व माता हँसा देवी थी। ये बाल्यावस्था में मननशील व कम बोलने

वाली थी। अत्यन्त कम आयु में घर त्याग बीकानेर के समराथल चल गये। वही शेष जीवन व्यतीत किया। इनके मुख से बोला गया प्रथम शब्द गुरू मुख धर्म बखानी था। इन्होंने विश्नोई सम्प्रदाय की समराथल में स्थापना की।

तथा 29 नियमों की स्थापना की थी। इनमें जीव हत्या, प्रकृति से प्रेम, छूआछूत का विरोध, जीवों में प्रति दया आदि थे इन्होंने प्रमुख का अत्यधिक महत्व दिया तथा तालवा मुकाम नामक स्थान पर अपना शरीर त्यागा। यही पर इनकी समाधि तथा विश्नोई सम्प्रदाय का

मन्दिर है। यह आजीवन ब्रह्मचारी रहे। इन्होंने विष्णु नाम पर अत्यधिक जोर दिया तथा जम्भसागर ग्रन्थ की रचना की। इनसे प्रभावित होकर बीकानेर नरेश ने अपने राज्यवृ़क्ष में खेजड़े को स्थान दिया। इनके नियम – नीला वस्त्र नहीं धारण करना, तम्बाकू, भांग व

अफीम का सेवन नहीं करना, हरे वृक्ष नहीं काटना।

  1. लालदास जी सम्प्रदाय –

प्रवर्तक लालदास जी, जाति – मेव, जन्म

धोली धूप, अलवर। पिता – चादलमल, माता सन्दा थी। निर्गुण भ्रम के उपासक, व हिन्दू मुस्लिम एकता पर जोर। मृत्यु नगला (भरतपुर) में हुई। इनका शिष्य निरंकारी होना चाहिए तथा उसे काला मुँह करके गधे पर बिठाकर पूरे समाज में घुमाया जाता है तथा उसके

बाद

मीठा वाणी बोलने के लिए शरबत पिलाया जाता है। लालदास जी का प्रमुख ग्रन्थ वाणी कहलाता है।

इन्हें शेरपुर (रामगढ़) गाँव में समाधि दी गई थी। प्रतिवर्ष अश्विन शुक्ल ग्यारह व माघ शुक्ल पूर्णिमा को इनके समाधि स्थल पर मेला भरता है। इनके अनुयायी मेव जाति में विवाह करते हैं।

  1. रामदेव जी –

नाथ सम्प्रदाय को महाराज की अनुग्रह से इनका जीवन

वैभवपूर्ण होता था और राजव्यवस्था में प्रभाव होता है। निम्बार्क उपनाम – हंस, सनकादिक, नारद।

प्रवर्तक – निम्बार्काचार्य। उपासना – राधाकृष्ण

के युगल स्वरूप की। निम्बार्काचार्य के बचपन का नाम – भास्कर तेलगंन ब्राह्मण थे, जन्म आन्ध्रप्रदेश भारत में मुख्य पीठ – वृन्दावन, राजस्थान में मुख्य पीठ – सलेमाबाद अजमेर। अन्य पीठ – उदयपुर, जयपुर। सलेमाबाद पीठ की स्थापना पशुराम देवाचार्य

ठिठारिया (सीकर) ……………… इनके अनुयायी तुलसी की लकड़ी की कंठी तथा आकार तिलक लगाते हैं।

  1. गौण्डिय सम्प्रदाय –

प्रवर्तक चैतन्य महाप्रभु, जन्म – पश्चिम बंगाल

प्रधान पीठ – राधेगोविन्द मन्दिर (जयपुर),

चार कृष्ण प्रतिमाएँ पूज्य हैं

(1) जीव गोस्वामी – राधागोविन्द (जयपुर)

(2) लोकनाथ स्वामी – राधादामोदर (जयपुर)

(3) मधुपण्डित – गोपीनाथ (जयपुर)

(4) सनातन गोस्वामी – मदनमोहन (करौली)

  1. वैष्णव सम्प्रदाय –

विष्णु के उपासक, प्रधान गद्दी – नाथद्वारा, कोटा,

रामानुज, रामानन्दी, निम्बार्क, वल्लभ सम्प्रदायों का उपसम्प्रदाय है तथा अवतारवाद में विश्वास करता है।

  1. निरंजन सम्प्रदाय –

प्रवर्तक हरिदास निरंजनी जन्म– कापडोद, नागौर,

सांखला राजपूत थे। प्रमुख पीठ – गाडा (नागौर)। डकैती को छोड़कर भक्ति मार्ग को अपनाया। राजस्थान के वाल्मिकी। इनके शिष्य घर बारी व विहंग।

प्रमुख ग्रन्थ भक्त, विरदावली, भृर्तहरि संवाद, साखी।

उदयपुर घराना शैव मत को मानना प्रमुख

  1. परनामी सम्प्रदाय –

प्रवर्तक प्राणनाथ जी। जन्म – जामनगर, गुजरात। प्रधान पीठ – पन्ना, मध्यप्रदेश में, प्रमुख ग्रन्थ – कुलजनम स्वरूप। राजस्थान में प्रमुख मन्दिर आदर्श

नगर, जयपुर में है। मुख्य आराध्य देव कृष्ण थे।

  1. वल्लभ सम्प्रदाय –

इसके प्रवर्तक वल्लभ आचार्य थे। जन्म चंपारन, मध्यप्रदेश में।उपागम पुष्टिमार्ग, उपासना कृष्ण,

बालस्वरूप, गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथ जी मन्दिर निर्माण करवाया। जोधपुर के महाराज जसवन्त सिंह प्रथम के काल में कन्दमखण्डी ( ) में श्रीनाथ जी की मूर्ति स्थापित की। दामोदर पुजारी द्वारा। औरंगजेब के आक्रमण के समय श्रीनाथ जी मन्दिर मूर्ति लेकर मेवाड़ के

नाथद्वारा में ठहरा। तब से यह वल्लभ सम्प्रदाय का प्रधान केन्द्र बन गया।

  1. नाथ सम्प्रदाय –

प्रवर्तक नाथ मुनि, वैष्णव व शैव सम्प्रदाय का संगम। चार प्रमुख गुरू __

1.मतसे